Friday, 6 January 2017

jhansi


रानी लक्ष्मीबाई साल 1858 में अंग्रेजों से लड़ते हुए शहीद हो गई थीं। उनकी वीरता के किस्से लोगों के जहन में आज भी बसे हुए हैं। इन्हीं किस्सों में झांसी में स्थित लक्ष्मीबाई का किला भी शामिल है। इस ऐतिहासिक इमारत का एक-एक कोना उनके साहस का गवाह है। एक समय में अंग्रेजों ने अस्तित्व खत्म करने के लिए किले पर 60-60 सेर वजनी तोपों के गोले बरसाए थे। यही नहीं, उन्होंने कई बार इस पर आक्रमण भी किया। इसके बावजूद 400 साल से ये किला पूरी शान के साथ खड़ा है।
ओरछा के राजा वीर सिंह देव ने 1613 ई. में झांसी किला बनवाया था। किला बंगरा नामक पहाड़ी पर बना है। वैसे तो ये किला निर्माण काल के बाद अलग-अलग राजाओं के अधीन रहा, ताकतवर मराठों का इस पर सैकड़ों साल तक शासन रहा, लेकिन बहादुरी की मिसाल बने इस किले को रानी लक्ष्मीबाई के नाम से ही जाना जाता है।
साल 1853 में झांसी की रानी बनी थीं लक्ष्मीबाई
पिता शिवराम भाउ के बाद गंगाधर राव झांसी के राजा बने। शादी के कुछ समय बाद रानी ने एक बेटे को जन्म दिया, लेकिन उसकी असमय मृत्यु हो गई। साल 1853 में राव के निधन के बाद लक्ष्मीबाई झांसी की रानी बनी थीं।
एक साल बाद ही रानी को किला छोड़ना पड़ा
राजा गंगाधर राव के निधन से पहले ही रानी ने एक पुत्र को गोद लिया था, लेकिन अंग्रेजों ने दामोदर राव को दत्तक पुत्र मानने से इनकार कर दिया। इस वजह से 28 अप्रैल 1854 को रानी लक्ष्‍मीबाई को ये किला छोड़ना पड़ा। वो काफी दिनों तक 'रानी महल' में रहीं (पहले इस जगह को सरकारी आवास कहा जाता था, लेकिन लक्ष्मीबाई के रहने के कारण इसे रानी महल कहा जाने लगा)।
1857 में फिर से हुआ आधिपत्‍य
इसी बीच विद्रोही सैनिकों ने 'खल्क खुदा का, मुल्क बादशाह का और हुक्म रानी लक्ष्मीबाई' का कहते हुए उन्‍हें अपना नेता मान लिया। रानी ने सैनिकों की मदद से अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह छेड़ दिया। इसके बाद भीषण युद्ध हुआ और 12 जून 1857 को लक्ष्मीबाई ने फिर से झांसी राज्य पर आधिपत्य जमा लिया और किले में आ गईं।